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रविवार, 26 अप्रैल 2020

My Silver lining during Covid-19 Pandemic

Who are you Corona/ What are you Corona

I knew can see sun’s corona
Only during solar eclipse,
Now Corona you are everywhere
Scaring everyone

Who are you Corona? What are you?

Are you an eclipse, Or cleaning the world,
A destructor, Or balancing act
Extreme Pain, Or some gain  
Miniscule, invisible, Yet covering the world.

Rivers were polluted
The roads were busy
There was fire in the forests
Ashes in the winds
Everywhere noise
Animals were endanger
Human steps on the moon
But earth was in pain

Then suddenly you came
Brought the fear of death
Scared humans
Science also in panic
So many deaths
No cure
Everything Uncertain

Now
Rivers flowing clean
Fragrant breeze
Blooming forests
Singing Birds
Animals wandering open
The healthy environment

Humans are quarantined
Socially distant but
Making meaningful connections
Emergency workers serving humanity
Everyone is more humble


You tell me Corona
Who are you Corona? What are you?

Are you an eclipse, Or cleaning the world,
A destructor, Or balancing act
Extreme Pain, Or some gain  
Miniscule, invisible, Yet covering the world
Natural or man-made disaster?

Whatever you are,
Whoever you are
We human will fight you off
For billions of years
We have faced evil like you
And always survived as better species
It’s just matter of time
When you’ll be history
Will have some loss
World will come out as winner.
Just go away Corona
Don’t test Our patience
Don’t test Our patience.

© Pemit प्रेमित @amitcma
(April 26th 2020 –Transliterated from a Hindi Poem)



शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

काम किये जा रहा हूँ


काम किये जा रहा हूँ

आराम कर सकूँ कुछ पल
इसलिए काम किये जा रहा हूँ।

स्मार्ट बने रहने की कोशिश में
फेसबुक, ट्वीट, इंस्टाग्राम किये जा रहा हूँ।

जवान बने रहने की हसरत में
बाल काले, जिम, योगा तमाम किये जा रहा हूँ।

दुनिया की होड़ में बने रहने को
जाने कितने दिन रात बर्बाद किये जा रहा हूँ।

आराम कर सकूँ कुछ पल
इसलिए काम किये जा रहा हूँ।

सब मेरे हों, मैं सबका बनूँ
इसी धुन में आहुति अपना आप दिए जा रहा हूँ।

हासिल कर सकूँ कुछ खास
जो है पास उसे भी खर्च किये जा रहा हूँ।

बचपन में सोचा बड़प्पन अच्छा
बड़ा होकर बचपना याद किये जा रहा हूँ।

आराम कर सकूँ कुछ पल
इसलिए काम किये जा रहा हूँ।

दादा दादी, नाना नानी किस्से बन गए
अब खुद ही नाती पोतो को किस्सा सुनाये जा रहा हूँ।

वो दिन अच्छे थे, वो शाम सुहानी
पुरानी यादों में नई सुबह का आग़ाज़ किये जा रहा हूँ।

जो भी है अच्छा है, जो होगा अच्छा होगा
जीने की उम्मीद में कुछ काम किये जा रहा हूँ।

आराम कर सकूँ कुछ पल
इसलिए काम किये जा रहा हूँ।

आराम कर सकूँ कुछ पल
इसलिए काम किये जा रहा हूँ।

© Pemit प्रेमित @amitcma  @Premit’sPics
Jan 2nd 2020



बहुत दिनों के बाद कुछ लिख पाया! आपलोगों के सुझाव के लिए प्रस्तुत! 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

सुनने के लिए नीचे क्लिक करें 👇🏻

आराम कर सकूँ कुछ पल इसलिए काम किये जा रहा हूँ।



आराम कर सकूँ कुछ पल इसलिए काम किये जा रहा हूँ।

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

२० साल पुराने स्वेटर की कहानी 

 



ये कहानी मेरी नहीं बल्कि उस स्वेटर की है जो मैंने पहना है. इस स्वेटर की उम्र २० साल हो गयी और इसकी दूसरी खासियत ये है की इसे मेरी माँ ने अपने हाथों से बुना है। 

एक स्वेटर की क्या कहानी हो सकती है? पर इस स्वेटर की है, इस स्वेटर के पीछे छिपे भावनाओं की है और कैसे इस स्वेटर के बनने की शुरुआत हुई उसकी भी है।  

आज से करीब २० - २२ साल पहले की बात है. हर साल जाड़े के पहले मम्मी लोगो का ग्रुप ऊन खरीदता और धड़ाधड़ स्वेटर, टोपी, दस्ताना बनाना शुरू। ऊन की भी कई क्वॉलिटी होतीं - जैसे वर्धमान, ओसवाल के ऊन का गोला बेहतर क्वालिटी का माना जाता था। ऊन खरीदने पर कांटा मुफ्त देने वाला दूकानदार बेहतर होता। ९ नंबर का कांटा सर्वव्यापी था। डिज़ाइन और कांटे का आदान प्रदान आस पड़ोस में होता रहता।  साथ ही बातें भी की फलां ने मेरा वो नंबर का कांटा नहीं लौटाया, उसने मुझे वो डिज़ाइन नहीं बताया, इस महीने के सरिता और गृहशोभा में नए डिज़ाइन आये हैं इत्यादि।  बच्चे भी सर्दी की धूप में ऊन का गोला बनाने में मगन रहते।  नए जुगाड़ लगाए जाते गोला बढ़िया और बेहतर बनाने के लिए।  

खैर  स्वेटर बुनने का दौर शुरू हो जाता - पहले छोटे बच्चों के लिए फिर बड़ो के लिए। उसमे मेरा नंबर भी आता, मैंने उस समय दिल्ली में रहना शुरू ही किया था तब। और चूँकि मैं बाहर रहता था इसलिए मेरे लिए थोड़े डिज़ाइनर स्वेटर्स बुने जाते। मुझे वो हाथ से बने स्वेटर्स पसंद नहीं आते, कोई मोटा होता बैग्गी की तरह तो कोई टाइट, किसी का गला तंग तो किसी की बाजू लम्बी।  किसी न किसी तरह का नुक्स मैं निकाल ही देता था। मम्मी निराश होती की इतने मेहनत से बुना है और तुम पहनते ही नहीं। हर बार स्वेटर खुलता उसको ठीक किया जाता पर मुझे कभी पसंद नहीं आता। 

वो शायद १९९८ (98) की सर्दियाँ थी जब मम्मी ने थक हार कर बोला तुम्ही बताओ कैसा स्वेटर होना चाहिए जो तुम पहनोगे। मैंने बोला बना बनाया ले लेंगे इतनी मेहनत की क्या जरुरत है।  पर मम्मी नहीं मानी की मेरे हाथ से बने स्वेटर में मेरा प्यार और आशीर्वाद रहेगा, नहीं भी पहनोगे तो रखे रहना कमसे कम मेरे मन को तो तसल्ली मिलेगी। खैर बात आई गई हो गयी। 

उन दिनों अक्षय खन्ना की एक नयी फिल्म आने वाली थी "आ अब लौट चलें " उस फिल्म के मुख्य गाने में अक्षय खन्ना ने एक स्वेटर पहना था जो बिलकुल साधारण और सौम्य था। ना जाने क्यूँ वो स्वेटर मुझे बहुत पसंद आया , शायद उसकी  सादगी भा गयी। मैं साफ़ कर दूँ की मुझे अक्षय खन्ना या इस फिल्म से कोई खास लगाव नहीं। बल्कि मैंने आज तक ये फिल्म पूरी नहीं देखी।  पर उस गाने और उस स्वेटर में ना जाने क्या बात थी।  तो वो गाना "आ अब लौट चलें" टीवी पे आ रहा था , चित्रहार या उसी तरह के किसी कार्यक्रम में।  हमलोग जमुई में थे उस समय। गाना देखते हुए  मैंने बोला अगर स्वेटर बनाना ही है तो इस तरह का साधारण होना चाहिए बिना किसी फूल पत्ती या पेड़ पौधे के डिज़ाइन वाला। बात फिर आई गयी हो गयी और उसके कुछ दिनों के बाद मैं वापिस दिल्ली चला गया।  

अचानक कुछ महीनों के बाद मुझे ये स्वेटर मिला, जो बिलकुल उसी गाने के स्वेटर जैसा साधारण और दो रंगो का था।  बिलकुल उसकी कॉपी तो नहीं पर उसी की तरह का है। कैसे मिला मुझे याद नहीं पर उस समय साधारणतया जब कोई दोस्त या पडोसी घर से दिल्ली आते तो वो सबका कुछ न कुछ सामान लाते।  याद नहीं किसने लाया था। पर पहली बार माँ के हाथो का बना ये स्वेटर मुझे पसंद आया। और इतना पसंद आया की आज २० साल बाद भी पहनने के बाद पहली बार पहनने का अहसास होता है। ऊन की गरमाहट के साथ साथ माँ के हाथों की ऊष्मा और उसके आँचल की ठंढक महसूस होती है। ये स्वेटर आज भी उतना ही अच्छा है , पता नहीं अच्छे ऊन का कमाल  है या माँ के हाथों का और उनकी भावनाओं का। 

२० साल पहले इसकी कीमत का अंदाजा नहीं था पर आज मेरे लिए ये बहुमूल्य है। अब मन करता है शायद फिर कोई मेरे लिए स्वेटर बुने , वैसे ही मेरा नाप ले और स्वेटर पूरी करने की जल्दी हो जिससे की इसी सर्दी में पहन सकूँ। और अब जब इतनी दूर अमेरिका में बैठा हूँ , इसको पहन कर सोच रहा हूँ "आ अब लौट चलें" पर लौटने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा , लौटने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा।  

                                                                   © Pemit प्रेमित @amitcma 

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

The Year


The Year 

How strange is the relationship between December and January?
Such as old memories and new promises
Both are quite delicate, both have depth
Both have stances, both have stumbles

Both of them are the same face same color
The same number of dates and the same cold
But the identity is different, the aura is Different
Different feelings, Different perspectives

One past, one future,
One end, one beginning
Like night to morning, morning to night
One has stories one has hopes
One is experience, the other has opportunities

Both are connected, such as the two ends of the thread
But still so near and together
Whatever December leaves behind, January adopts them
And those who has the promises for January, they followed from December

It takes 11 months to travel from January to December
But just in a moment you arrive from December to January
When they go farther, they change the weather
When they come closer, they change the Year

Looks like only two other months of the year
But capable of making and destroying everything
Together they keep tied up the rest of the months
and made their separation a festival for the world
Not to forget the memories and always look for future!

© Pemit प्रेमित @amitcma 
(Dec 7th 2018 - inspired from one of Hindi poems from social media)



शनिवार, 23 अगस्त 2014

मेरे पापा!!

मेरे पापा!!

हँसमुख मददगार मिलनसार,
जिन्दादिल इंसान हो तुम।
पाते आराम जिसके तले,
बरगद की वो छांव हो तुम।

करते नहीं कभी किसी को निराश,
एेसे हरदिल अजीज हो तुम।
नींद में स्वप्न से निश्चल मुस्कान,
ऐसे निस्वार्थ मासूम हो तुम।

मुझको दिया जीवन साकार,
मेरे ईश मेरे भगवान् हो तुम।
दोस्त, अभिभावक, सहायक,
मेरे पापा! सबसे महान हो तुम।
--- प्रेमित (c) (3rd Dec 2002 written on Papa's Birthday)

शनिवार, 8 मार्च 2014

मशाल....

(मेरी डायरी के 2007 नारी दिवस के पन्ने से)


मशाल....


होतें हैं एक व्यक्ति के कई रूप

एक छोड़कर अक्सर सभी डरावने कुरूप

मानव में ही दानव भी होते हैं

पर नारी शायद ही दानवी होती है....


एक ही नारी कई रूपों में निभाती है सारी जिम्मेवारी

नारी के सारे रूप होते हैं विलक्षण मनोहारी

शक्ति है नारी की अपार

सिर्फ नारी ही कर सकती है जीवन निर्माण....


हमेशा हुआ है नारी का निरादर

इसलिये है समाज आज बदतर....


पहचान ली है उसने अपनी शक्ति अपार

नही रहेगी अब वो अबला बनकर

उठने दो ऊनको समाज की रीढ़ बनकर

कल्पणा, किरण, सानिया, बढ़ने दो इन्हें

मत रोको इनको, यें ही हैं मशााल

जो करेंगी भविष्य उज्जवल....


शुक्रिया अपार सहन शक्ति का

जिसने सहा है न जाने क्या क्या

पर जिस दिन टूट गया ये बाँध

सोंचों,   कहँा बह जाएगें हम़़़़....


करो सम्मान नारी का

यही है समाधान सारी समस्याओं का

क्योंकी कर दिया है नारी ने साबित

की नारी है सचमुच महाऩ़़़...


--- प्रेमित (c) 8th March 2014 (on International Women's Day - Thanking all the women)



।।।नारी ईक्कीसा।।।

।।।नारी ईक्कीसा।।।

माँ पत्नी
दीदी बेटी
बहन बुआ
चाची मामी
दादी नानी
भाभी साली
प्रेमिका मित्र!

जननी पालिका
गुरू सहायिका
उध्यमी संचालिका
रक्षक मार्गदर्शिका
माया मोहिता
दुर्गा लक्ष्मी
सरस्वती काली!

रूप अनेक
हर रूप निराला
शक्ति अपारा
नमस्कारम् 
नमस्कारम्
सर्व नारीः
नमोस्तुते।।।
--- प्रेमित (c) 8th March 2014 (on International Women's Day - Thanking all the women)

सोमवार, 6 जनवरी 2014

रूह की आस

रूह की आस


वो बेगाने होकर लाड़ जताते है। 

उन्हे क्या पता बेगानों से दिल नही लगाते है।।


नाम लेने से हो जाते हैं बदनाम।

बेनामी जीने का भी अपना ही नशा है।।


दूसरों की फ़िक्र में जिंदगी गुज़ारी।

कब कहाँ हमने अपनी रूह को छुआ है।।

--- प्रेमित (c) 6th Jan 2014



शनिवार, 21 दिसंबर 2013

माँ

माँ!!

माँ हमेशा कुछ दे जाती है

जन्म से पहले कोख में आश्रय देती
आकार लेते ही स्तन निचोड़ने देती
माँ हमेशा कुछ दे जाती है।

मुसीबतों में आँचल छुपने को देती
कितनी गलतियाँ छिपाती लाड़ती- दुलारती
बचाती दुनिया की जालिम नजरों से
सम्पूर्ण विकास का मौका देती
माँ हमेशा कुछ दे जाती है।

उज्जवल भविष्य के लिये, मन को मार
अपने से दूर जाने देती है
हमारी भलाई के न जाने क्या क्या
मनौतियाँ करती मनाती
हमेशा दुआयें देती
माँ हमेशा कुछ दे जाती है।

--- प्रेमित (c) 21st Dec 2013 (on Mom's Birthday)

सोमवार, 18 नवंबर 2013

अकेले का मेला

अकेला हूँ नही
अकेला रहूँगा नही
दुनिया के मेले

आना जाना
हमेशा होता अकेले
कौन रोता है
यादें रह जाती अकेले

अकेला हूँ नही
अकेला रहूँगा नही
जश्न के हैं झमेले।।

--- प्रेमित (c) 16th Nov 2013 (@ Great Wall of China)

रविवार, 24 मार्च 2013

भारतीयता - Just thought today in Holi Milan Samaroh

भारतीयता - Just thought today in Holi Milan Samaroh

विदेश में आकर ज्यादा देशी हो जाते हैं,
लोगों को भारतीयता सीखाते हैं।

थूकते थे पान की पीक सड़क पे हम भी,
विदेश में मुॅह मे ही गटक जाते हैं।

खेलते हैं होली यहां भी जमकर रंगों से,
पर वो देश का रंग कहा ला पाते हैं।

विदेश में आकर ज्यादा देशी हो जाते हैं,
लोगों को भारतीयता सीखाते हैं।

--- प्रेमित (c) 24th March 2013, Holi Milan BIJHAR, 2013

शनिवार, 16 मार्च 2013

प्रवासी....

हर बार मंज़िल तक पँहुच नाहासिल सा लगा,
ज़ो देखा हर ओर, हर चेहरा बेगाना सा लगा ।

घर से दूर घर बनाना, हमेशा बंजारो सा लगा,
लाख कर ली वफाऐ़ं, हर लम्हा मगर पराया सा लगा।

तड़प रहा हूँ, आकर तेरी आगोश में सर छुपाने को,
चला जिस रस्ते ताउम्र, वापसी उसपे अनजाना सा लगा।

ना वो जमीं ना वो आसमां, चमचमाती भीड़ का कारवां,
दफ़न ना करना यहां मुझे, रूह भी अपना बेगाना सा लगा।

--- प्रेमित (c) 16th March 2013

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

मर्म कविता का

मर्म कविता का

अगर हो समझना मर्म कविता का
जब भी पढ़ना, मन लगाकर पढ़ना
अपनी कविता मानकर तुम कविता पढ़ना

क्यूंकि कवि कहता है सदा ही
कहानी दूसरों की अपनी ही जबानी

इसलिए गर हो समझना कवि को
खुद को कवि बनाकर, तुम कविता पढ़ना...

--- प्रेमित (c)

शनिवार, 12 मई 2012

निशब्द - शब्द

निशब्द - शब्द

शब्द ना मिले तो क्या कहु
जिन्दगी तमाम शब्दों के हवाले,
पर क्या है मेरी जिन्दगी के शब्द
जो बयां करे मेरी जिंदगानी.

ना रोटी कपड़ा ना मकान
ना दवा दारू ना दूकान,
भागता हूँ इन शब्दों के पीछे
पर ये मेरी जिन्दगी के शब्द नहीं.

शब्द करते हैं बयां
विचार सुविचार या दुर्विचार,
लेकिन मेरी तेरी जिंदगानी,
होती है बिना शब्दों के बयां

निशब्द नहीं है पर ये
है हमारे भी शब्द,
प्रेरणा अमित मिल प्रेमित भये
अवि करे बयां जिंदगानी.

ये शब्द सिर्फ तुम्हारे लिए .... प्राणु.....

--- प्रेमित (c) 12th May 2012. — with Prerna Sahay at Blk 637 Yishun St 61.